सम्मान पाने के लिए अहंकार को दूर करना होगा - - - आचार्य नंदकुमार शर्मा

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*TOP NEWS छत्तीसगढ़ तिल्दा नेवरा ब्लॉक से गोवर्धन यदु की रिपोर्ट*

*तिल्दा-नेवरा*

समीपस्थ ग्राम सरफोंगा मे जारी भागवत कथा मे सोमवार को भागवत आचार्य पंडित नंदकुमार शर्मा जी, निनवा वाले ने मानव जीवन के कर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य अपने कर्म और व्यवहार के द्वारा ही सम्मान प्राप्त करता है. जो दूसरे का सम्मान करना जानते है उसे ही सम्मान मिलता है. किसी कार्य के छोटे या बड़ा होने से सम्मान नहीं मिलता है बल्कि कार्य को ईमानदारी और परिश्रम के साथ करने से सम्मान मिलता है. दूसरों को नीचा दिखाकर उनका अपमान करने के बाद स्वयं सम्मान पाने की लालसा कभी नहीं करे. उन्होंने कहा कि अपने आप को श्रेष्ठ समझकर दूसरे को कमजोर नहीं समझना चाहिए. आचार्य जी ने सूर्यवंश के राजा अम्बरीष की कथा सुनाए. राजा अम्बरीष और उनकी पत्नी दोनों मिलकर का एकादशी का व्रत करते थे जिनकी चर्चा तीनों लोक मे होने लगी. परन्तु दुर्वासा ऋषि अपने आप को श्रेष्ठ मानकर उनके व्रत को भंग करवा कर राजा अम्बरीष और उनकी पत्नी को लोगों के समाने अपमानित करना चाहा. लेकिन भगवान ने उनके व्रत को भंग होने नहीं दिया और अपने सुदर्शन चक्र के द्वारा राजा और रानी दोनों की रक्षा कराए और ऋषि दुर्वासा को दंड देकर उनके अभिमान को दूर किया. आचार्य शर्मा ने कहा कि ज्ञान प्राप्त करना और ज्ञानी होना अच्छी बात है परंतु अपने ज्ञान का घमंड करना और अपने आप को ही श्रेष्ठ और उत्तम समझना ये गलत होता है. इसी घमंड के कारण इंसान का पतन होता है. आचार्य शर्मा ने एकादशी व्रत की महिमा बताते हुए कहा कि प्रत्येक माह मे 2 एकादशी होती है जो मनुष्य एकादशी का व्रत करते है उनके जीवन का संकट दूर होते है और उन्हें सुख समृद्धी की प्राप्ति होती है. एकादशी व्रत करने से मनुष्य के पापो का नाश हो जाता है. उन्होंने बताया कि एकादशी  भगवान विष्णु की बेटी है. एकादशी तिथि मे उनका प्राकट्य हुआ था इस कारण उनका नाम एकादशी रखा गया. मानव जीवन की मनोकामना को पूर्ण करने के लिए एकादशी व्रत करना चाहिए.. उन्होंने कहा कि सारे व्रतों मे सबसे उत्तम व्रत है एकादशी का व्रत. जो मनुष्य एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा और श्रद्धा पूर्वक करता है वह मरणोपरांत मोक्ष गति को प्राप्त करते हुए सीधे बैकुंठ धाम का भागी बनता है. आगे आचार्य जी सूर्यवंश की कथा मे भगवान राम के जन्म की कथा सुनाए. उन्होंने बताया कि सूर्यवंशी महाराज राजा दशरथ के यहा अयोध्या मे भगवान अपने चार अंशों के साथ अवतार लेकर आते है. राजा दशरथ के तीन रानियाँ कौशल्या, केकई और सुमित्रा हुए जिनके चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न हुए. उन्होंने कहा कि दशरथ जी साक्षात वेद है उनकी तीनों रानिया वेद की ऋचाऐ है. भगवान राम ही जीवन मे आनंद है, सीता जी शांति है और लक्ष्मण जी वैराग्य के प्रतीक है. भगवान राम अपनी लीला के माध्यम से लोगों को मर्यादा की सीख दिए है. मानव जीवन मे मर्यादा कितनी जरूरी है और मर्यादा का पालन कैसे करना चाहिए ये हमे भगवान राम के जीवन से पता चलता है. मानव जीवन मे मर्यादा अत्यंत आवश्यक है. मर्यादा और संस्कार के बिना मनुष्य जीवन पशु समान माना गया है. मनुष्य के संस्कार ही उनके व्यवहार और आचरण को दर्शाता है. भगवान राम एक आदर्श पुत्र,  भाई, शिष्य, पति, पिता के रूप मे समाज के सामने आते है. किस प्रकार से हमे अपने रिश्तों की मर्यादा निभानी चाहिए ये हमे राम जी के जीवन से सीखना चाहिए. आगे आचार्य जी ने कृष्ण जन्म की कथा बताये और कहा कि कंस के कारागृह मे बंद माता देवकी के गर्भ से भगवान कृष्ण का अवतार होता है..कृष्ण जन्मोत्सव मे सभी श्रोतागण झुम उठे और नृत्य किए।

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