दबेना गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क से वंचित, ग्रामीणों को पेड़ों और छतों पर चढ़कर करनी पड़ती है बात

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नरहरपुर। कांकेर जिले के नरहरपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम दबेना आज भी मोबाइल नेटवर्क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। डिजिटल इंडिया, ऑनलाइन सेवाओं और सुशासन की दिशा में लगातार प्रयासों के बावजूद एक हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव के ग्रामीण नेटवर्क के अभाव में अनेक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि मोबाइल पर बात करने के लिए लोगों को मकानों की छतों, पेड़ों तथा अन्य ऊंचे स्थानों का सहारा लेना पड़ता है।
दबेना गांव राजनीतिक दृष्टि से क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण गांव माना जाता है। यह गांव देश और प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले जनप्रतिनिधियों से जुड़ा रहा है। गांव से जुड़े स्वर्गीय अरविंद नेताम चार बार सांसद रहे तथा केंद्र सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। वहीं क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व विधायक एवं पूर्व वन मंत्री शिव नेताम का भी यह गांव रहा है।

चार बार सांसद और केंद्रीय मंत्री सहित कई जनप्रतिनिधि देने वाला दबेना गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहा है। ग्रामीणों के अनुसार गांव में पूर्व में जिओ कंपनी का मोबाइल टावर स्थापित किया गया था, जिससे नेटवर्क समस्या दूर होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन कुछ समय बाद टावर बंद हो गया और बाद में उसे हटा दिया गया। वर्तमान में गांव में किसी भी कंपनी का मोबाइल टावर नहीं है। इसके चलते ग्रामीणों को मोबाइल पर बात करने और इंटरनेट उपयोग करने के लिए पेड़ों, मकानों की छतों तथा अन्य ऊंचे स्थानों का सहारा लेना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से मोबाइल टावर की मांग की जा रही है, लेकिन आज तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है।

ग्रामीणों के अनुसार कुछ वर्ष पहले गांव में जिओ कंपनी का टावर स्थापित किया गया था, जिससे लोगों को उम्मीद जगी थी कि नेटवर्क की समस्या दूर हो जाएगी। हालांकि तकनीकी कारणों से टावर कुछ महीनों तक ही संचालित हो पाया और बाद में बंद हो गया। इसके बाद टावर को हटा दिया गया। वहीं बीएसएनएल टावर स्थापना की भी चर्चा हुई थी, लेकिन आज तक गांव में कोई नया टावर स्थापित नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप पूरा गांव फिर से नेटवर्क विहीन स्थिति में पहुंच गया।

गांव में संचालित लैम्प्स (सहकारी समिति) पर आसपास के नौ गांवों के किसान निर्भर हैं। नेटवर्क नहीं होने के कारण धान भुगतान, पंजीयन, आधार सत्यापन और अन्य ऑनलाइन कार्य प्रभावित होते हैं। स्थिति यह है कि लैम्प्स कार्यालय की छत पर ऊंचा पोल लगाकर डोंगल टांगा गया है, फिर भी पूरे दिन में मुश्किल से कुछ किसानों का ही काम हो पाता है। कई किसानों को एक ही कार्य के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाना पड़ता है।

रोहित मरकाम, लैम्प्स में पदस्थ कंप्यूटर ऑपरेटर ने बताया कि नेटवर्क की समस्या के कारण ऑनलाइन कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं। कई बार पूरे दिन में केवल तीन-चार लोगों का ही काम हो पाता है। इंटरनेट सिग्नल नहीं मिलने से किसानों के पंजीयन, भुगतान और अन्य जरूरी कार्य लंबित हो जाते हैं, जिससे ग्रामीणों को बार-बार कार्यालय आना पड़ता है।

ग्राहक सेवा केंद्र (सीएससी) में भी नेटवर्क की गंभीर समस्या बनी हुई है। संचालक नेटवर्क प्राप्त करने के लिए डोंगल को थैले में रखकर रस्सी के सहारे हाईमास्ट लाइट के ऊंचे पोल पर लटकाता है, ताकि किसी तरह इंटरनेट सिग्नल मिल सके। इसके बावजूद पूरे दिन में सीमित लोगों का ही काम हो पाता है। नेटवर्क नहीं मिलने पर ग्रामीणों को लगभग 10 किलोमीटर दूर नरहरपुर मुख्यालय जाकर अपने ऑनलाइन कार्य पूरे करने पड़ते हैं।

कमलेश कुमार मरकाम ने बताया कि उन्हें अपने कार्यों के लिए करीब सात किलोमीटर दूर से सहकारी समिति और अन्य कार्यालयों तक आना पड़ता है, लेकिन नेटवर्क नहीं होने के कारण कई बार बिना काम हुए वापस लौटना पड़ता है। इससे समय और धन दोनों की बर्बादी होती है तथा ग्रामीणों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

नेटवर्क की कमी का सबसे अधिक असर किसानों, विद्यार्थियों, बुजुर्ग पेंशनधारियों और आम ग्रामीणों पर पड़ रहा है। गांव में बैंकिंग सेवाओं के लिए कियोस्क सेंटर मौजूद है, लेकिन इंटरनेट नहीं होने के कारण अधिकांश समय कार्य प्रभावित रहता है। राशन वितरण में उपयोग होने वाली पॉश मशीन भी कई बार नेटवर्क के अभाव में काम नहीं करती, जिससे हितग्राहियों को दूसरे गांवों या नेटवर्क उपलब्ध स्थानों तक जाना पड़ता है।

प्रियंका मंडावी, छात्रा ने बताया कि मोबाइल नेटवर्क नहीं होने से पढ़ाई पर सीधा असर पड़ रहा है। ऑनलाइन अध्ययन सामग्री, शैक्षणिक जानकारी और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी आवश्यक सूचनाएं समय पर नहीं मिल पातीं। कई बार पढ़ाई से संबंधित कार्यों के लिए गांव से बाहर जाकर नेटवर्क तलाशना पड़ता है, जिससे विद्यार्थियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

स्वास्थ्य सेवाएं भी इस समस्या से प्रभावित हैं। गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य एवं आयुष केंद्र मौजूद है, लेकिन किसी मरीज की तबीयत बिगड़ने या दुर्घटना होने की स्थिति में एंबुलेंस बुलाने के लिए भी ग्रामीणों को दूसरे गांव जाकर फोन करना पड़ता है। आपातकालीन परिस्थितियों में यह स्थिति गंभीर चुनौती बन जाती है।

दबेना गांव में हाई स्कूल, सहकारी समिति, स्वास्थ्य केंद्र, पटवारी कार्यालय, वन विभाग तथा कृषि विभाग से संबंधित शासकीय कार्यालय संचालित हैं, लेकिन मोबाइल नेटवर्क नहीं होने के कारण ऑनलाइन कार्यों में लगातार बाधा आती है। कर्मचारियों और ग्रामीणों दोनों को परेशानी उठानी पड़ती है, जिससे कई आवश्यक कार्य समय पर पूरे नहीं हो पाते।

ग्रामीणों का कहना है कि इस संबंध में कई बार प्रशासन और संबंधित विभागों को अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में शीघ्र मोबाइल टावर स्थापित किया जाए अथवा आसपास के टावरों की कनेक्टिविटी बढ़ाकर नेटवर्क सुविधा उपलब्ध कराई जाए, ताकि दबेना सहित आसपास के गांवों के लोगों को राहत मिल सके।

आज जब देश तेजी से डिजिटल सेवाओं और तकनीकी विकास की ओर बढ़ रहा है, तब कांकेर जिले का दबेना गांव नेटवर्क प्राप्त करने के लिए डोंगल को थैले में बांधकर ऊंचे पोल पर लटकाने को मजबूर है। यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में दूरसंचार सुविधाओं की जमीनी हकीकत को भी उजागर करती है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि शासन-प्रशासन इस लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान कर गांव को भी डिजिटल सुविधाओं से जोड़ेगा।

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