जनता के आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देखना दुर्भाग्यपूर्ण :- विनोद उसेंडी सदस्य - जनपद पंचायत कोयलीबेड़ा
सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले कोयलीबेड़ा क्षेत्र की 18 पंचायतों के सरपंच,4 जनपद सदस्य,1 जिला पंचायत सदस्य, 68 गांवों के गायता,पटेल एवं हजारों ग्रामीण अपनी 10 सूत्रीय जायज मांगों को लेकर 27 मई से शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे थे। आंदोलन के छह दिनों तक धरने पर बैठे रहने के बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई।
जब कोयलीबेड़ा में बैठे आंदोलनकारियों की आवाज अनसुनी कर दी गई, तब क्षेत्र की जनता ने सामूहिक निर्णय लेकर 2 जून से अंतागढ़ में चक्का जाम आंदोलन शुरू किया। यह निर्णय किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि क्षेत्र की जनता की पीड़ा और वर्षों की उपेक्षा का परिणाम था।
भाजपा जिला अध्यक्ष श्री महेश जैन द्वारा इस आंदोलन को संविधान विरोधी,गुंडागर्दी तथा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की साजिश बताना आंदोलनरत जनता का अपमान है।यह आंदोलन न कांग्रेस का था,न आम आदमी पार्टी का। यह पूरी तरह जनता,जनप्रतिनिधियों और सर्व आदिवासी समाज के नेतृत्व में अपनी मूलभूत सुविधाओं और अधिकारों के लिए लड़ा गया जनआंदोलन था।
22 फरवरी 2026 को क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का प्रतिनिधिमंडल अपनी समस्याओं को लेकर रायपुर पहुंचा था।मुख्यमंत्री से मुलाकात की उम्मीद में लगभग 12 घंटे तक इंतजार किया गया, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी और सभी को निराश होकर लौटना पड़ा। इसके अलावा वर्षों से आवेदन,ज्ञापन और निवेदन के माध्यम से समस्याओं को उठाया जाता रहा है,लेकिन समाधान नहीं हुआ।
यदि समस्याओं का समाधान इतना आसान था कि केवल एक बार बताने से सब कुछ कोयलीबेड़ा में संचालित हो जाता, तो फिर बीते 20 वर्षों से क्षेत्र की जनता इन समस्याओं से क्यों जूझ रही है?
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि 68 गांवों के ग्रामीण भीषण गर्मी में लगातार आठ दिनों तक सड़क पर बैठे रहे,जबकि क्षेत्र के विधायक और सांसद आंदोलन स्थल पर आकर जनता से संवाद तक नहीं कर सके।आंदोलन और चक्का जाम के बाद केवल लिखित आश्वासन दिया गया है, जबकि अधिकांश मांगें आज भी अधूरी हैं।
आज क्षेत्र की जनता का एक ही सवाल है—
जब जनता अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतर चुकी है, तब क्षेत्र के विधायक और सांसद जनता के बीच आकर संवाद क्यों नहीं कर रहे हैं? आखिर जनता से मिलने और उनकी बात सुनने में किस बात का डर है?
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि 68 गांवों की जनता का है, जो अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों से जवाब चाहती है।
*"जनता की आवाज को राजनीति का नाम देकर दबाया नहीं जा सकता। जनहित की मांगों का समाधान ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।"*
— विनीत
कोयलीबेड़ा की पीड़ित जनता

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