भानुप्रतापपुर कागजी प्रक्रियाओं में उलझी स्वास्थ्य व्यवस्था, करोड़ों के संसाधन निष्क्रिय, मरीजों की मुश्किलें बढ़ी

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*TOP NEWS छत्तीसगढ़ जिला उत्तर बस्तर कांकेर ग्रामीण से संतोष बाजपेयी की रिपोर्ट*

*भानुप्रतापपुर*

 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्वास्थ्य सेवाएं इन दिनों अव्यवस्था और प्रशासनिक शिथिलता का उदाहरण बनती जा रही हैं। अस्पताल में उपलब्ध महंगे संसाधन और उपकरण उपयोग के अभाव में बेकार पड़े हैं, जबकि दूसरी ओर मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी भटकना पड़ रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, अस्पताल में डॉक्टरों की अनियमित उपस्थिति, दवाइयों की कमी और आपातकालीन सेवाओं की अनुपलब्धता के चलते अधिकांश मरीजों को रेफर किया जा रहा है। इससे न केवल आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, बल्कि गंभीर मामलों में जान का जोखिम भी बढ़ गया है।

एम्बुलेंस सेवा ठप, आपात स्थिति में संकट

करीब एक वर्ष से 108 संजीवनी एक्सप्रेस सेवा भानुप्रतापपुर में उपलब्ध नहीं है। इसे अन्य क्षेत्र में शिफ्ट किए जाने के बाद यहां की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित हो गई है। वर्तमान में मरीजों को निजी वाहनों या वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

सोनोग्राफी सेवा बाधित, मशीन पर उठे सवाल

अस्पताल में डेढ़ वर्ष से सोनोग्राफी सेवा बंद पड़ी है। नई मशीन उपलब्ध कराए जाने के बाद भी अल्प समय में खराबी आने से इसकी गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

ऑक्सीजन प्लांट निष्क्रिय, सिलेंडर पर निर्भरता

कोविड-19 काल के दौरान स्थापित लगभग 10 लाख रुपए की लागत का ऑक्सीजन प्लांट पिछले तीन वर्षों से बंद पड़ा है। ऑपरेटर की नियुक्ति न होने के कारण इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिससे अस्पताल को बाहरी स्रोतों से ऑक्सीजन सिलेंडर मंगाने पड़ रहे हैं।

दान में मिली एम्बुलेंस कागजी अड़चनों में फंसी

करीब 50 लाख रुपए की लागत वाली अत्याधुनिक एम्बुलेंस, जो एक निजी समूह द्वारा प्रदान की गई थी, आरटीओ संबंधी औपचारिकताएं पूर्ण न होने के कारण तीन वर्षों से उपयोग में नहीं लाई जा सकी है।

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन में जवाबदेही का अभाव है। कर्मचारियों की मनमानी और शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न होने से स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है।

प्रबंधन का पक्ष

ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. शचेन्द्र गोटा ने बताया कि 108 एम्बुलेंस को अन्य क्षेत्र में भेजा गया है, जबकि दान में मिली एम्बुलेंस के कागजात प्रक्रियाधीन हैं। ऑक्सीजन प्लांट ऑपरेटर के अभाव में बंद है और व्यवस्थाओं को सुचारू करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

निष्कर्ष

स्पष्ट है कि संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद उनका प्रभावी उपयोग सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। यदि शीघ्र ही प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाएं और अधिक प्रभावित हो सकती हैं, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।

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