दुर्ग में 20 दिन में कार्रवाई, भानुप्रतापपुर में 30 दिनों बाद भी जांच रिपोर्ट पर पर्दा... आखिर सीएमएचओ किसका इंतजार कर रहे हैं।

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*TOP NEWS छत्तीसगढ़ जिला उत्तर बस्तर कांकेर ग्रामीण से संतोष बाजपेयी की रिपोर्ट*

*भानुप्रतापपुर*
 छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला अस्पताल में सिकल सेल पीड़िता दीपिका गाढा की मौत के मामले में स्वास्थ्य विभाग ने महज 20 दिनों के भीतर जांच पूरी कर दी डॉक्टरों सहित सात स्वास्थ्य कर्मियों पर कार्रवाई कर दी। जांच में लापरवाही सामने आते ही जिम्मेदारों पर गाज गिरी और प्रशासन ने यह संदेश दिया कि मरीज की मौत के मामलों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लेकिन उत्तर बस्तर कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर स्थित गौतम अस्पताल में नवजात शिशु और उसकी माता की मौत के मामले में तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। जानकारी के अनुसार इस मामले की विभागीय जांच पूरी हुए लगभग एक माह बीत चुका है। जांच रिपोर्ट तैयार होने की बात भी सामने आ चुकी है, लेकिन जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने अब तक उसे सार्वजनिक नहीं किया है।
यहीं से सवाल खड़े होने शुरू हो जाते हैं।
आखिर सीएमएचओ रिपोर्ट सार्वजनिक करने से क्यों बच रहे हैं? यदि जांच पूरी हो चुकी है तो रिपोर्ट पर पर्दा क्यों पड़ा है? किस प्रशासनिक प्रक्रिया का इंतजार है, या फिर किसी अन्य कारण से फाइल आगे नहीं बढ़ रही?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा पीड़ा उस परिवार की है जिसने एक ही घटना में मां और नवजात दोनों को खो दिया। न्याय की उम्मीद में परिजन कभी थाना तो कभी जिला मुख्यालय के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन उन्हें अब तक केवल आश्वासन ही मिला है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्व आदिवासी समाज ने भी जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर शीघ्र जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की थी। इसके बावजूद विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई।
दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने भी अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की जांच समिति गठित कर मामले की जांच कराने की बात कही थी। लेकिन उस जांच का क्या हुआ? रिपोर्ट बनी या नहीं? यदि बनी तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? क्या दोषियों की जिम्मेदारी तय हुई? इन सवालों के जवाब आज तक सामने नहीं आए हैं। इससे लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर वह जांच सिर्फ औपचारिकता थी या फिर उसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
दुर्ग और भानुप्रतापपुर के दोनों मामलों की तुलना अब आम जनता खुद कर रही है। एक ओर 20 दिनों के भीतर जांच पूरी कर कार्रवाई हो जाती है, वहीं दूसरी ओर 30 दिनों बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो पाती। आखिर दोनों मामलों में इतना बड़ा अंतर क्यों?
सबसे बड़ा सवाल सीधे जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) से है।
यदि जांच में किसी की लापरवाही नहीं मिली है तो रिपोर्ट सार्वजनिक कर दीजिए, ताकि अफवाहों पर विराम लगे। और यदि लापरवाही मिली है तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों? आखिर किस बात का इंतजार किया जा रहा है?
जितनी देर होगी, उतने ही संदेह गहराते जाएंगे। प्रशासन की पारदर्शिता पर भी सवाल उठेंगे। न्याय केवल जांच पूरी करने से नहीं मिलता, बल्कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने और दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई होने से मिलता है।
आज पूरा भानुप्रतापपुर, सर्व आदिवासी समाज, मृतक परिवार और आम जनता जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से सिर्फ एक जवाब चाहती है—आखिर जांच रिपोर्ट कब सार्वजनिक होगी?
कहीं ऐसा तो नहीं कि समय बीतने के साथ मामला स्वतः शांत हो जाए, इसी उम्मीद में फाइल को रोककर रखा गया है? यदि ऐसा नहीं है तो जिला स्वास्थ्य विभाग को तत्काल सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब यह केवल एक परिवार के न्याय का मामला नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता के विश्वास का भी प्रश्न बन चुका है। यदि दुर्ग में 20 दिनों के भीतर कार्रवाई संभव है, तो भानुप्रतापपुर में 30 दिनों बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न होना निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनका जवाब अब जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और जिला प्रशासन को देना ही होगा।

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