3 घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार तड़पती रही मासूम, डॉक्टर ने झाड़ा पल्ला, अधिकारी ने छिपाई पहचान! आखिर किसके भरोसे भानुप्रतापपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था

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*TOP NEWS छत्तीसगढ़ जिला उत्तर बस्तर कांकेर ग्रामीण से संतोष बाजपेयी की रिपोर्ट*

*भानुप्रतापपुर*
 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भानुप्रतापपुर की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। देर रात एक तीन वर्षीय मासूम बच्ची की तबीयत गंभीर होने पर उसे जिला अस्पताल कांकेर रेफर किया गया, लेकिन रेफर किए जाने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर सामने आई। बच्ची को तत्काल बेहतर इलाज की जरूरत थी, मगर एंबुलेंस के इंतजार में करीब तीन घंटे तक वह अस्पताल में ही तड़पती रही।
परिजनों के मुताबिक, बच्ची की हालत गंभीर थी और चिकित्सकों ने उसे तत्काल जिला अस्पताल कांकेर ले जाने की सलाह दी। रेफर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजन एंबुलेंस का इंतजार करते रहे, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी एंबुलेंस अस्पताल नहीं पहुंची। इस दौरान मासूम की हालत को लेकर परिजनों की चिंता लगातार बढ़ती रही।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी गंभीर मरीज को रेफर किया जाता है, तो क्या अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल रेफरल पर्ची बनाने तक सीमित रह जाती है? यदि मरीज की हालत गंभीर थी, तो उसे समय पर एंबुलेंस उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? और यदि एंबुलेंस उपलब्ध नहीं थी, तो क्या अस्पताल प्रबंधन ने वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश की?
इस पूरे मामले में स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि मासूम बच्ची के परिजन मदद के लिए इधर-उधर भटकते रहे, जबकि जिम्मेदार व्यवस्था की ओर से उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। वहीं, मामले की जानकारी लेने पहुंचे लोगों को जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान तक स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई, जिससे यह सवाल और गहरा गया कि आखिर स्वास्थ्य केंद्र में जवाबदेही तय करने वाला जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
यह पहला मौका नहीं है जब भानुप्रतापपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे हों। इससे पहले भी अस्पताल की कार्यप्रणाली, मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में तीन वर्षीय मासूम को तीन घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार करना महज एक घटना नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अब सवाल यह है कि यदि रात के समय किसी गंभीर मरीज को तत्काल रेफर करने की जरूरत पड़े और एंबुलेंस समय पर उपलब्ध न हो, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले की जांच कर यह तय करेगा कि एंबुलेंस पहुंचने में देरी क्यों हुई और इस दौरान मरीज को समय पर चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिल सकी?
भानुप्रतापपुर जैसे ग्रामीण क्षेत्र में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हजारों लोगों के लिए जीवनरक्षक व्यवस्था का काम करता है। ऐसे में यदि रेफर मरीज को ही समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती, तो फिर आम ग्रामीण आखिर किस भरोसे इस स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर रहें?
जब परिजनों और ग्रामीणों ने डॉक्टर से पूछा कि आखिर एंबुलेंस अब तक क्यों नहीं पहुंची, तो कथित तौर पर जवाब मिला“हमने फोन कर दिया है, अब एंबुलेंस नहीं आई तो हम क्या कर सकते हैं।”
डॉक्टर का यह कथित जवाब न केवल गैर-जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि क्या किसी मरीज को सिर्फ रेफर कर देना ही डॉक्टर और अस्पताल की जिम्मेदारी पूरी कर देता है? क्या गंभीर हालत में मरीज की सुरक्षित रवानगी और समय पर एंबुलेंस उपलब्ध कराना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है?
यदि मरीज को रेफर करने के बाद घंटों तक एंबुलेंस का इंतजार करना पड़े और इस दौरान उसकी हालत बिगड़ती रहे, तो आखिर इसकी जवाबदेही किसकी होगी? भानुप्रतापपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सामने आया यह मामला जिम्मेदार अधिकारियों के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
मामला तब और गंभीर हो गया, जब जिला स्तर के अधिकारियों और सीएमएचओ से संपर्क किया गया। जानकारी सामने आई कि अस्पताल के लिए एंबुलेंस उपलब्ध थी, लेकिन उसका चालक फोन तक नहीं उठा रहा था। सवाल यह है कि यदि चालक ड्यूटी पर था तो उसने फोन क्यों नहीं उठाया? और यदि वह ड्यूटी पर नहीं था, तो उसकी जगह वैकल्पिक चालक की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में एक चालक के फोन न उठाने से किसी मरीज की जिंदगी घंटों तक दांव पर लग सकती है?
अस्पताल प्रशासन के पास इन सवालों का कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। आखिरकार जिला प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद परिवहन संघ की एंबुलेंस से मासूम को कांकेर रेफर किया जा सका। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि परिजन और ग्रामीण जिला अधिकारियों तक अपनी गुहार नहीं पहुंचाते, तो क्या वह मासूम पूरी रात अस्पताल में ही तड़पती रहती? और अगर इलाज में देरी के कारण रास्ते में कोई अनहोनी हो जाती, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होती?
यह घटना केवल एंबुलेंस की लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आखिर मरीज की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी किसकी है—सिर्फ परिजनों की, या फिर उस सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की, जिस पर जनता भरोसा करके अस्पताल पहुंचती है?
इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पताल की लचर और सवालों के घेरे में खड़ी कार्यप्रणाली को भी उजागर कर दिया। ड्यूटी रोस्टर में डॉक्टरों और नर्सों के नाम तो दर्ज थे, लेकिन उनके मोबाइल नंबर तक उपलब्ध नहीं थे। इससे भी अधिक गंभीर बात यह सामने आई कि जिस एंबुलेंस चालक की ड्यूटी निर्धारित थी, उसका नाम तक ड्यूटी रोस्टर में दर्ज नहीं था। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं किस व्यवस्था और किसकी निगरानी में संचालित हो रही हैं? जब मरीज की जान पर बन आए, तब जिम्मेदार व्यक्ति तक पहुंचने का कोई स्पष्ट माध्यम ही न हो, तो जवाबदेही किसकी तय होगी? क्या अस्पताल प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?
मौके पर पहुंचे BPM की भूमिका भी सवालों के घेरे में, पहचान छिपाने का आरोप
इतना ही नहीं, घटनास्थल पर पहुंचे ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर (BPM) का रवैया भी पूरे मामले को और गंभीर बना गया। जब उनसे उनकी पहचान और मौके पर पहुंचने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने स्वयं को अधिकारी के रूप में परिचित कराने के बजाय यह कहते हुए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का प्रयास किया कि “मैं तो यहीं का लोकल आदमी हूं, आवाज सुनकर अंदर आया हूं।” हालांकि, सूत्रों के अनुसार उन्हें जिला स्तर से मामले की जानकारी लेने के लिए मौके पर भेजा गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि वे वास्तव में विभागीय जिम्मेदारी के तहत मौके पर पहुंचे थे, तो उन्होंने अपनी पहचान स्पष्ट करने से परहेज क्यों किया? क्या एक जिम्मेदार अधिकारी के लिए अपनी पहचान छिपाना और जवाबदेही से बचने का प्रयास करना उचित है? यह पूरा घटनाक्रम न केवल BPM की भूमिका, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
भानुप्रतापपुर अस्पताल की बदहाली कोई नई कहानी नहीं है। डॉक्टरों की कमी, अव्यवस्था, कथित लापरवाही और चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर यह अस्पताल पहले भी कई बार सवालों के घेरे में आ चुका है। हर घटना के बाद जांच के आदेश होते हैं, सुधार के दावे किए जाते हैं और जिम्मेदारी तय करने की बातें सामने आती हैं, लेकिन कुछ समय बाद हालात फिर उसी ढर्रे पर लौट आते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इन जांचों और दावों का असर जमीन पर कब दिखाई देगा?
जब एक गंभीर मरीज को समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती, ड्यूटी रोस्टर में जरूरी जानकारी तक पूरी नहीं होती, जिम्मेदार अधिकारी अपनी पहचान स्पष्ट करने से बचते नजर आते हैं और डॉक्टर मरीज को रेफर करने के बाद अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं, तो फिर आम जनता सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा कैसे करे? क्या मरीज और उसके परिजनों को इसी तरह व्यवस्था की खामियों के बीच अपनी जिंदगी की जंग लड़ने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
अब वक्त केवल जांच और खानापूर्ति का नहीं, बल्कि ठोस और कठोर कार्रवाई का है। एंबुलेंस व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी तय हो, ड्यूटी में लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई हो, अधूरे ड्यूटी रोस्टर की जांच कर जवाबदेही तय की जाए और यदि किसी अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए अपनी पहचान छिपाई है, तो इसकी भी निष्पक्ष जांच कर आवश्यक विभागीय कार्रवाई की जाए।
क्योंकि सरकारी अस्पतालों की लापरवाही का खामियाजा किसी फाइल, रिपोर्ट या सरकारी बयान को नहीं भुगतना पड़ता—इसकी कीमत सीधे मरीज और उसके परिवार को अपनी जिंदगी, समय और उम्मीद से चुकानी पड़ती है। सवाल अब सिर्फ एक घटना का नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही का है।
मौके पर पहुंचे संबलपुर के उपसरपंच एवं सनातन समाज के अध्यक्ष गौरव चोपड़ा ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि तीन वर्षीय मासूम बच्ची को गंभीर हालत में तीन घंटे तक एंबुलेंस के लिए तड़पते रहना पूरे स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता और बदहाली को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि यदि एक मरीज को समय पर एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा दिलाने के लिए भी जिला स्तर के अधिकारियों से गुहार लगानी पड़े, तो फिर स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर (BPM) के कथित रवैये को भी गंभीरता से लेते हुए कहा कि संकट की घड़ी में मौके पर पहुंचे जिम्मेदार अधिकारी द्वारा अपनी पहचान स्पष्ट करने के बजाय खुद को स्थानीय व्यक्ति बताना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब जनता जवाब मांग रही हो, तब जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की जरूरत होती है। स्वास्थ्य व्यवस्था में लापरवाही और अधिकारियों की कथित उदासीनता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।
गौरव चोपड़ा ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था में तत्काल सुधार नहीं किया गया और इस पूरे मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो क्षेत्रवासी आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन किया जाएगा और तब तक आंदोलन जारी रहेगा, जब तक स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली के लिए जिम्मेदारी तय कर ठोस कार्रवाई नहीं की जाती।

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